राजस्थान के जर्जर स्कूलों पर सरकार की जवाबदेही पर उठ रहे गंभीर सवाल – जानिए

राजस्थान में जर्जर स्कूल भवनों की भयावह स्थिति ने सरकार और शिक्षा मंत्री की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े किए। हजारों भवनों की मरम्मत अभी तक अधूरी।

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राजस्थान में सरकारी स्कूलों की भयावह स्थिति ने एक बार फिर सरकार और शिक्षा मंत्री मदन दिलावर को कठघरे में खड़ा कर दिया है। झालावाड़ के पिपलोदी गांव में हुए दर्दनाक हादसे के बाद भी स्कूल भवनों की स्थिति में कोई ठोस सुधार नहीं हुआ है। 2025 में जारी शिक्षा विभाग के सर्वे ने प्रशासनिक विफलताओं की पूरी तस्वीर सामने रख दी है—3,768 स्कूल भवन पूरी तरह जर्जर, 83,783 कक्ष उपयोग के योग्य नहीं और हजारों शौचालय टूटे हुए। इतना बड़ा संकट किसी एक विभाग की चूक नहीं, बल्कि समूचे शासन तंत्र की सुस्ती और संवेदनहीनता का परिणाम है। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब बच्चों की जान खतरे में है, तब सरकार की प्राथमिकताएँ आखिर क्या हैं?

झालावाड़ हादसे में सात बच्चों की मृत्यु ने पूरे राजस्थान को झकझोर दिया था। हाई कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेते हुए सरकार को सख्त फटकार लगाई और तत्काल सुरक्षा योजना का खाका पेश करने के निर्देश दिए। अदालत ने यहां तक कहा कि यदि योजना समय पर नहीं दी गई, तो सचिव स्तर के अधिकारी को कोर्ट में पेश होना पड़ेगा। इसके बावजूद स्कूलों की बदहाली में ठोस सुधार न होना चौंकाने वाला है। अदालत की चेतावनी का असर प्रशासन पर क्यों नहीं हुआ? क्या सरकार को यह लगता है कि इस मसले का कोई राजनीतिक नुकसान नहीं होगा, इसलिए इसे टालना आसान है?

शिक्षा मंत्री का विधायकों को पत्र लिखकर उनके कोष से 20 प्रतिशत राशि स्कूल भवनों की मरम्मत के लिए मांगना एक बड़ा सवाल खड़ा करता है। यदि यह पूरी तरह राज्य सरकार की जिम्मेदारी है, तब विधायकों पर आर्थिक बोझ डालने की जरूरत क्यों पड़ी? विधायक कोष क्षेत्रीय विकास के लिए होता है, न कि किसी विभाग की विफलताओं की भरपाई के लिए। यह कदम यह संकेत देता है कि शिक्षा विभाग के पास समस्याओं को हल करने के लिए पर्याप्त बजट या इच्छाशक्ति—दोनों में कमी है। इससे यह भी सवाल उठता है कि क्या सरकार सिर्फ योजनाएँ कागजों पर बना रही है, ताकि कोर्ट की नाराजगी शांत हो जाए?

सरकार ने स्कूलों के लिए 1,624 करोड़ रुपये की मरम्मत योजना घोषित की थी, जिसे हाई कोर्ट ने अपर्याप्त बताया। लाखों कक्षों और शौचालयों की स्थिति को देखते हुए यह बजट वाकई एक बड़े पहाड़ के सामने एक छोटी सी बाल्टी जैसा लगता है। यह समझने योग्य है कि इतने विशाल ढांचे के पुनर्निर्माण के लिए बहुवर्षीय और बड़े पैमाने की योजना की आवश्यकता है, पर सरकार ने ऐसा रोडमैप अब तक क्यों नहीं तैयार किया? क्या विभाग जानता ही नहीं कि समस्या कितनी व्यापक है, या जानकर भी अनदेखा कर रहा है?

राजस्थान के ग्रामीण क्षेत्रों में कई स्कूल ऐसे हैं जहाँ बच्चे टूटे कमरों और टीन शेड्स के नीचे पढ़ने को मजबूर हैं। कुछ भवनों में दरारें इतनी गहरी हैं कि किसी भी दिन कोई अनहोनी हो सकती है। सवाल यह उठता है कि नियमित निरीक्षण की व्यवस्था कहाँ गायब हो गई? क्या शिक्षा विभाग के अधिकारी वर्षों से इन स्कूलों का निरीक्षण नहीं कर रहे, या उनकी रिपोर्टें फाइलों में दबा दी जाती हैं? यदि निरीक्षण होते तो 78 साल पुराने भवनों को जर्जर घोषित करने में 2025 क्यों लग गया?

पीपलोदी हादसे के बाद विपक्ष ने इस मुद्दे को लगातार उठाया है और इसे सरकार की लापरवाही का नतीजा बताया है। विपक्ष के तर्क का आधार भी मजबूत है—क्योंकि यदि किसी निजी भवन में दरारें दिखती हैं, तो प्रशासन तुरंत कार्रवाई करता है, लेकिन हजारों बच्चों की जान से जुड़े सरकारी भवनों को वर्षों तक अनदेखा किया गया। क्या यह इसलिए कि सरकारी स्कूल गरीब और ग्रामीण बच्चों के लिए हैं, इसलिए राजनीतिक प्राथमिकता में नीचे हैं?

राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि शिक्षा भवनों की मरम्मत को लगातार टालना एक तरह की “राजनैतिक कैल्कुलेशन” है। सड़कें, पुल, पेयजल जैसी परियोजनाएं अधिक दिखती हैं, जिनका राजनीतिक लाभ अधिक मिलता है। लेकिन स्कूल भवनों की मरम्मत फ़ोटो फ्रेम में नहीं आती, इसलिए इस पर तेजी से खर्च नहीं किया जाता। यह कड़वी सच्चाई है, लेकिन सर्वे के आंकड़े इसी वास्तविकता की गवाही देते हैं।

शिक्षा मंत्री का यह कहना कि “स्कूल भवनों में भारी निर्माण की आवश्यकता है, इसलिए विधायक कोष से धन दिया जाए”—यह विभागीय अक्षमता को स्वीकारने जैसा है। यदि हर समस्या का समाधान विधायक कोष है, तो फिर विभागीय बजट का महत्व क्या रह जाता है? राज्य सरकार के पास करोड़ों की योजनाओं के लिए पैसा है, फिर बच्चों की सुरक्षा के लिए पर्याप्त राशि क्यों नहीं?

राज्य सरकार पर यह भी सवाल खड़ा होता है कि क्या वह अपने विभिन्न विभागों के बीच समन्वय स्थापित कर पा रही है? शिक्षा विभाग, पीडब्ल्यूडी, पंचायत राज, जिला प्रशासन—इन सभी की इस मुद्दे में भूमिका है। लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि ये विभाग अपनी-अपनी दिशा में काम कर रहे हैं और समग्र समाधान कहीं नहीं दिख रहा। जब तक एकीकृत योजना नहीं बनेगी, तब तक न तो मरम्मत समय पर होगी और न सुरक्षा सुनिश्चित।

इस पूरे घटनाक्रम में सबसे बड़ा नुकसान बच्चों का हो रहा है। वे सुरक्षित भवनों में शिक्षा पाने के मूलभूत अधिकार से वंचित हैं। घर-परिवार में गरीबी, परिवहन की समस्याएँ, और अब जर्जर भवन—इन सबका बोझ अंततः उसी बालक पर पड़ता है जो सरकारी स्कूल में पढ़ने आता है। सवाल यह है कि क्या सरकार इस बोझ को समझ रही है?

निष्कर्षतः, राजस्थान सरकार और शिक्षा विभाग का प्रदर्शन गंभीर चिंताओं से भरा है। यह सिर्फ तकनीकी समस्या नहीं, बल्कि संवेदनशीलता की कमी का मामला है। जनता, विशेषकर ग्रामीण परिवारों, का सवाल वाजिब है—जब मंदिर, सड़क और सभा के लिए करोड़ों खर्च किए जा सकते हैं, तो बच्चों की सुरक्षा पर क्यों नहीं?

राज्य सरकार को अब निर्णय लेना होगा कि शिक्षा वास्तव में उसकी प्राथमिकता है या सिर्फ भाषणों का हिस्सा। यदि राजनीतिक इच्छाशक्ति मजबूत नहीं हुई, तो पिपलोदी जैसे हादसे सिर्फ फाइलों में दर्ज नहीं रहेंगे, बल्कि भविष्य में फिर किसी मां-बाप को अपने बच्चे की अर्थी उठानी पड़ सकती है—जो राजस्थान की राजनीति पर एक अमिट कलंक होगा।

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