हवाई अड्डे की ठंडी हवा में एक बार फिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मुस्कान वही पुरानी चमक लेकर उभरी जब रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन का विमान रनवे पर उतरा। यह दृश्य अब नया नहीं रहा—पीएम मोदी का प्रोटोकॉल तोड़कर स्वयं एयरपोर्ट पहुंचना पिछले 11 वर्षों में कई बार देखा गया है। ओबामा से लेकर शिंजो आबे, डोनाल्ड ट्रंप से लेकर शेख हसीना और अब पुतिन—ऐसे ‘असाधारण स्वागत’ अब सामान्य होते जा रहे हैं। सवाल यह नहीं कि प्रधानमंत्री किसका स्वागत कर रहे हैं; असली सवाल यह है कि आखिर क्यों प्रधानमंत्री को बार-बार स्थापित प्रोटोकॉल को तोड़ना पड़ रहा है? क्या यह भारतीय संस्कृति ‘अतिथि देवो भव’ का विस्तार है या राजनीतिक ब्रांडिंग का व्यवस्थित खेल?
एक साधारण नागरिक की आंखों से देखें तो यह दृश्य बेहद आकर्षक लगता है—सूट-बूट में सजे प्रधानमंत्री विदेशी नेताओं का स्वागत करते हुए जैसे किसी परिवार का मुखिया किसी रिश्तेदार का सम्मान कर रहा हो। 2015 में ओबामा को गले लगाने का वह वायरल क्षण, 2020 में ट्रंप के लिए ‘नमस्ते ट्रंप’ का विशाल आयोजन, या अब 2025 में पुतिन के लिए रेड कार्पेट बिछाना—इन सभी पलों ने मोदी की ‘लोकप्रिय नेता’ की छवि को मजबूत किया। लेकिन दूसरी ओर, विदेश मंत्रालय के प्रोटोकॉल नियम साफ कहते हैं कि पीएम का एयरपोर्ट स्वागत केवल अत्यंत असाधारण परिस्थितियों में ही किया जाना चाहिए। फिर भी यह ‘असाधारण’ अब ‘नियमित’ क्यों बनता जा रहा है? क्या विदेश नीति में विश्वास की कमी है कि बिना प्रधानमंत्री की व्यक्तिगत मौजूदगी के भारत उतना प्रभावशाली नहीं दिखता?
कई विशेषज्ञों का मानना है कि यह सब एक राजनीतिक थिएटर का हिस्सा है—एक सावधानी से तैयार किया गया प्रदर्शन, जिसका उद्देश्य केवल राजनयिक संदेश देना नहीं बल्कि घरेलू राजनीतिक संदेशों को भी मजबूत करना है। बीजेपी की राजनीति का केंद्रीय तत्व ‘मजबूत नेतृत्व’ और ‘राष्ट्रवाद’ रहा है, इसलिए हर बड़ा विदेशी दौरा एक मंच बन जाता है जिस पर प्रधानमंत्री स्वयं को ‘वैश्विक नेता’ की भूमिका में प्रस्तुत करते हैं। 2017 में शेख हसीना का स्वागत उस समय हुआ था जब तीस्ता जल विवाद हिल रहा था; क्या यह रणनीतिक संदेश था या बांग्लादेश की ओर झुकाव दिखाने का राजनीतिक प्रयास? शिंजो आबे का स्वागत भी ज़ोरदार रहा था—लेकिन आज बुलेट ट्रेन परियोजना देरी और लागत के दलदल में फंसी है। ट्रंप का स्वागत लाखों लोगों की भीड़ के बीच हुआ, लेकिन उसी अवधि में अमेरिका के साथ भारत का व्यापार घाटा बढ़ता गया। इन उदाहरणों से सवाल उठता है—क्या यह स्वागत केवल ‘स्टेजक्राफ्ट’ है, असल लाभ से परे?
अब बात रूस की। पुतिन की यात्रा ऐसे समय हो रही है जब भारत पश्चिमी दबाव, विशेषकर अमेरिकी प्रतिबंधों की चेतावनियों के बीच रूस से सस्ता तेल खरीद रहा है। क्या पीएम मोदी का यह ‘व्यक्तिगत स्वागत’ भारत-रूस संबंधों की मजबूती का प्रतीक है, या यह इस बात का संकेत कि भारत को अब विदेश नीति में व्यक्तिगत नेतृत्व के सहारे चलना पड़ रहा है? क्या यह राजनयिक मजबूती है, या राजनयिक कमजोरी, जहां ‘व्यक्तिगत गारंटी’ ही मुख्य साधन बन गई है?
इसके अलावा, ऐसे स्वागत कार्यक्रमों का एक आर्थिक और प्रशासनिक पहलू भी होता है। भारी सुरक्षा तंत्र, सड़क बंद होना, प्रोटोकॉल की तैयारी, और करोड़ों का खर्च—क्या यह सब उचित है? जब देश की बड़ी आबादी बेरोजगारी, महंगाई और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी से जूझ रही है, क्या ऐसे कार्यक्रमों का औचित्य नहीं पूछा जाना चाहिए? विपक्ष की चुप्पी भी उतनी ही रहस्यमयी है—क्या वे मोदी की लोकप्रियता से डरते हैं या खुद भी सत्ता में आने पर यही ‘हाई-प्रोफाइल स्वागत’ करने का सपना देखते हैं?
मोदी की यह ‘एयरपोर्ट डिप्लोमेसी’ एक तरह की राजनीतिक कथा है—जैसे किसी फिल्म का हीरो हर सीन में खुद स्पॉटलाइट ले लेता है। जहां विदेश नीति संस्थाओं, टीमों और प्रक्रियाओं से चलनी चाहिए, वहीं इसे अब व्यक्तित्व-केंद्रित मॉडल में बदल दिया गया है। पर सवाल यह है कि क्या यह मॉडल भारत के हितों को दीर्घकाल में मजबूत करेगा या नुकसान पहुंचाएगा? बार-बार प्रोटोकॉल तोड़ना एक दिन ऐसा संदेश भी दे सकता है कि भारत की विदेश नीति व्यक्तिगत शो पर आधारित है, संस्थागत मजबूती पर नहीं।
इतिहास भी कठोर है। ओबामा के समय की परमाणु डील वर्षों बाद भी व्यवहार में नहीं उतर सकी। जापानी बुलेट ट्रेन परियोजना कछुए की चाल से सरक रही है। ट्रंप के तमाशे ने कोई ठोस आर्थिक फायदा नहीं दिया। तो फिर क्या पुतिन का स्वागत वास्तविक रणनीतिक लाभ देगा, या यह भी राजनीतिक प्रतीकवाद तक सीमित रह जाएगा?
समय आ गया है कि सरकार स्पष्ट करे—यह ‘विशेष स्वागत’ दोस्ती का प्रतीक है, कूटनीति का हिस्सा है, या 2029 की चुनावी रणनीति? क्या यह भारत को विश्व गुरु बनाएगा, या केवल एक व्यक्ति की छवि को चमकाने का साधन है? लोकतंत्र सवालों पर चलता है, और सवाल अब यह है—प्रधानमंत्री मोदी को बार-बार प्रोटोकॉल क्यों तोड़ना पड़ रहा है?
अगर सरकार इन सवालों के जवाब नहीं देती, तो यह ‘व्यक्तिगत स्पर्श’ एक दिन ‘व्यक्तिगत विफलता’ का प्रतीक बन जाएगा। भारत को मजबूत संस्थाएं चाहिए, मजबूत तस्वीरें नहीं।


