दिल्ली की सर्द हवाओं में जब स्मॉग की परतें लिपट जाती हैं, तो यह सिर्फ आंखों को चुभने वाली धुंध नहीं, बल्कि एक अदृश्य महामारी है। संसद में विपक्ष के हंगामे और सड़कों पर मास्क लगाए लोगों की फौज के बीच, एक सवाल गूंज रहा है: क्या सरकार के आंकड़े वाकई हकीकत बयान कर रहे हैं? राज्यसभा में बीजेपी सांसद लक्ष्मीकांत बाजपेयी के सवाल पर राज्य मंत्री कीर्तिवर्धन सिंह ने कहा कि 2025 में दिल्ली का एक भी दिन ‘गंभीर प्लस’ (AQI 450+) नहीं पहुंचा। अच्छे दिनों (AQI<200) की संख्या 2016 के 110 से बढ़कर 200 हो गई, जबकि ‘बहुत खराब’ और ‘गंभीर’ दिनों की संख्या 2024 के 71 से घटकर 50 रह गई। औसत AQI 187 रहा, जो 8 सालों में सबसे कम है (2020 को छोड़कर)।
लेकिन यह आंकड़े जनता की सांसों से मेल नहीं खाते। रीयल-टाइम डेटा दिखाता है कि 4 दिसंबर 2025 को AQI 302 से 348 तक पहुंचा, जो ‘बहुत खराब’ से ‘गंभीर’ श्रेणी में है। ग्लोबल बर्डन ऑफ डिजीज (GBD) अध्ययन के मुताबिक, 2023 में दिल्ली में हर 7 में से 1 मौत (करीब 17,188) प्रदूषण से जुड़ी थी, जो हृदय रोग या डायबिटीज से भी ज्यादा। 2025 के स्टेट ऑफ ग्लोबल एयर रिपोर्ट में भारत ने विश्व की 30% प्रदूषण-संबंधी मौतें झेलीं, और दिल्ली इसमें सबसे ऊपर। विशेषज्ञ चेताते हैं: PM2.5 कण फेफड़ों से खून में घुसकर स्ट्रोक, अस्थमा और कैंसर का सबब बनते हैं, खासकर बच्चों और बुजुर्गों के लिए।
सरकार के प्रयासों की बात करें तो CAQM एक्ट 2021 के तहत 95 कानूनी निर्देश जारी हो चुके हैं। GRAP प्लान ने स्टेज-III में निर्माण-विघटन पर बैन, BS-III/IV वाहनों पर रोक और स्कूलों में हाइब्रिड मोड लागू किया। 7 अक्टूबर को फसल अवशेष जलाने पर मंत्री-स्तरीय बैठक हुई, और नियमित समीक्षाएं जारी हैं। फिर भी, पराली जलाना, वाहन उत्सर्जन और उद्योगों की समस्या बरकरार है। विपक्ष आरोप लगाता है कि डेटा में हेरफेर हो रहा, जैसे मॉनिटरिंग स्टेशनों पर पानी छिड़कना।
दिल्ली अब सिर्फ राजधानी नहीं, एक स्वास्थ्य आपदा का प्रतीक है। सुधार के संकेत सकारात्मक हैं, लेकिन जब तक मौसमी स्पाइक्स (जैसे नवंबर में AQI 700+) न रुकें, ये आंकड़े महज कागजी जीत हैं। क्या समय है कड़े इलेक्ट्रिक वाहन लक्ष्य, हरित ऊर्जा और क्षेत्रीय सहयोग का? वरना, यह स्मॉग न सिर्फ सांस लेगा, बल्कि जिंदगियां भी निगलेगा।


