बिहार विधानसभा चुनाव 2025: मतदाता धोखाधड़ी के आरोपों का तथ्यात्मक विश्लेषण-लोकतंत्र पर सवाल

बिहार चुनाव 2025 में एनडीए की भारी जीत के बाद मतदाता सूची, डुप्लिकेट वोटरों, योजनाओं और ईवीएम को लेकर उठे धोखाधड़ी के आरोपों का तथ्यात्मक विश्लेषण।

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बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के नतीजों ने राज्य की राजनीति में एक बड़ा भूचाल ला दिया है। 14 नवंबर को घोषित परिणामों में एनडीए ने 243 में से 202 सीटें जीतकर एक ऐतिहासिक बढ़त हासिल की, जबकि महागठबंधन मात्र 35 सीटों पर सिमट गया। एनडीए का कुल वोट शेयर 48.2% और विपक्ष का 36.9% रहा। मतदान प्रतिशत भी 66.91% के साथ रिकॉर्ड स्तर पर था। लेकिन इस जीत के तुरंत बाद जिस तरह मतदाता धोखाधड़ी, वोटर डिलीशन, डुप्लिकेट वोटर और कैश-ट्रांसफर जैसे मुद्दों ने राजनीतिक माहौल को घेर लिया, उसने इस चुनाव की विश्वसनीयता पर बड़े सवाल खड़े कर दिए।

सबसे बड़ा विवाद चुनाव से ठीक पहले लागू की गई ‘जीविका दीदी’ योजना को लेकर हुआ। राज्य सरकार ने 1.25 करोड़ महिलाओं को 10,000 रुपये सीधे उनके खातों में भेजे। यह एक सामाजिक-आर्थिक सहायता योजना बताई गई, लेकिन इसके भुगतान की टाइमिंग विवाद का मूल कारण बनी। अक्टूबर और नवंबर—यानी मतदान से ठीक पहले—चार किस्तों में 40,000 करोड़ रुपये से अधिक की रकम ट्रांसफर की गई। विपक्ष ने इसे ‘लीगलाइज्ड वोट खरीदी’ कहा और पूछा कि अगर यह सामान्य कल्याण योजना थी, तो इसे चुनाव मॉडल कोड लागू होने से पहले क्यों नहीं पूरा किया गया। चुनाव आयोग ने हालांकि इसे नियमों के खिलाफ नहीं माना, लेकिन यह तथ्य कि 1.8 लाख जीविका दीदियों को चुनाव ड्यूटी पर लगाया गया और कई वीडियो में वे राजनीतिक प्रचार में भी दिखाई दीं, इस फैसले पर संदेह बढ़ाता है।

सबसे गंभीर आरोप मतदाता सूची में बड़े पैमाने पर की गई कटौती का है। चुनाव आयोग के विशेष गहन संशोधन (SIR) के दौरान लगभग 80 लाख नाम हटाए गए, जिससे मतदाता संख्या 7.89 करोड़ से घटकर 7.42 करोड़ रह गई। विपक्ष का दावा है कि यह ‘चयनात्मक हटाव’ था, जिसमें सीमांचल, दलित और अल्पसंख्यक क्षेत्रों में नाम कटौती औसतन 7.7% तक रही। कई मीडिया संस्थानों और फैक्ट-चेकर्स की रिपोर्टों में 14.35 लाख डुप्लिकेट वोटरों का संदिग्ध डेटा सामने आया, जिससे मतदाता सूची की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े हुए।

कुछ उदाहरणों ने विवाद को और हवा दी—जैसे भाजपा कार्यकर्ताओं के नाम दिल्ली, हरियाणा और बिहार की सूची में एक साथ पाए जाना, और बिहार में एक ही व्यक्ति का अलग-अलग बयानों में खुद दो राज्यों में वोट डालने का दावा करना। हालांकि चुनाव आयोग ने इन मामलों को “तकनीकी त्रुटि” बताया, लेकिन विपक्ष ने इसे ‘सिस्टमेटिक मैनिपुलेशन’ कहा।

चुनाव के दौरान मुफ्त परिवहन भी विवाद का कारण बना। मतदान से ठीक पहले हरियाणा और दिल्ली से बिहार आने वाली चार विशेष ट्रेनों का खर्च भाजपा द्वारा वहन किया गया, यह बात खुद कई यात्रियों ने कैमरे पर स्वीकार की। अगर यह सही है, तो रिप्रेज़ेंटेशन ऑफ पीपल एक्ट 1951 की धारा 123(5) के अनुसार, किसी भी पार्टी या उम्मीदवार द्वारा मतदाता को मुफ्त परिवहन उपलब्ध कराना भ्रष्ट आचरण की श्रेणी में आता है। चुनाव आयोग ने इस पर कोई कार्रवाई नहीं की, जिससे इस आरोप की गंभीरता और बढ़ गई।

पारदर्शिता के सवाल सबसे ज्यादा सीसीटीवी नियमों में किए गए संशोधनों को लेकर उठे। नई व्यवस्था के अनुसार, पोलिंग बूथ का फुटेज चुनाव के 45 दिन बाद डिलीट किया जा सकता है। यह बदलाव तब आया जब कई जगहों पर बूथ कैप्चरिंग, डुप्लिकेट वोटिंग और फर्जी मतदान के वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने लगे थे। विपक्ष का आरोप है कि फुटेज न रखना “सबूत को नष्ट करने का सुनियोजित प्रयास” है, जबकि चुनाव आयोग का तर्क है कि महिलाओं की गोपनीयता की सुरक्षा जरूरी थी। लेकिन यह तर्क तब कमजोर पड़ जाता है जब पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने 2024 में स्पष्ट आदेश दिया था कि चुनावी फुटेज को सुरक्षित रखना और उपलब्ध कराना आवश्यक है।

इन सभी विवादों के बीच चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर भी गंभीर सवाल उठे। 2023 के बाद से सीईसी की नियुक्ति प्रक्रिया में बदलाव किया गया, जिसमें समिति से CJI को हटाकर एक केंद्रीय मंत्री को शामिल किया गया। इससे आयोग की स्वतंत्रता पर संदेह और गहरा हो गया। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के पारिवारिक सदस्यों की प्रशासनिक नियुक्तियों का समय भी सवालों के दायरे में आया, जिसे विपक्ष “हितों का टकराव” बता रहा है।

इन सभी आरोपों के बावजूद यह तथ्य भी महत्वपूर्ण है कि एनडीए का वोट शेयर पिछले चुनावों से मेल खाता है। 2024 लोकसभा चुनावों में भी बिहार में एनडीए को 45–48% वोट मिला था। अतः सिर्फ़ वोट प्रतिशत के आधार पर चुनाव को ‘पूर्णतया फर्जी’ कहना अतार्किक हो सकता है, लेकिन मतदाता सूची कटौती, वित्तीय प्रलोभन और प्रशासनिक पारदर्शिता पर सवालों को पूरी तरह खारिज भी नहीं किया जा सकता।

इस विवाद का सबसे बड़ा नुकसान लोकतंत्र की विश्वसनीयता को हुआ है। चुनाव में विश्वास तभी बनता है जब प्रक्रिया सभी पक्षों को निष्पक्ष और पारदर्शी लगे। यदि मतदाता सूची, सीसीटीवी फुटेज, कैश योजनाएं और परिवहन—सब पर सवाल हों, तो परिणाम भले ही लोकप्रिय हों, लोकतंत्र कमजोर होता है।

आगे का रास्ता स्पष्ट है। चुनाव आयोग को SIR प्रक्रिया की स्वतंत्र जांच, डुप्लिकेट वोटर ऑडिट, VVPAT की 100% गिनती और सभी चुनावी फुटेज को सार्वजनिक रिकॉर्ड बनाने जैसे सुधार करने होंगे। वरना हर चुनाव का परिणाम “स्कैम” कहलाएगा, चाहे विजेता कोई भी हो।

आर्यन जाखड़
आर्यन जाखड़http://politicsheadline.in
आर्यन जाखड़ एक राजनीतिक और व्यापारिक समाचार लेखक हैं, जो भारतीय शासन, चुनाव और आर्थिक रुझानों पर अपनी सटीक विश्लेषणात्मक रिपोर्टिंग के लिए जाने जाते हैं। आर्यन जाखड़, पॉलिटिक्स हैडलाइन के प्रधान संपादक हैं।

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