बिहार विधानसभा चुनाव 2025 का परिणाम भारतीय राजनीति में एक गहरा मोड़ बनकर उभरा है। 14 नवंबर को आए नतीजों में एनडीए ने 243 में से 202 सीटें जीतकर ऐसा प्रभुत्व स्थापित किया, जिसकी कल्पना शायद खुद सत्ता पक्ष ने भी न की हो। रिकॉर्ड वोटिंग प्रतिशत, महिलाओं की ऐतिहासिक भागीदारी और ग्रामीण क्षेत्रों में भारी उत्साह ने इस चुनाव को लोकतांत्रिक सहभागिता की मिसाल बनाया, लेकिन उसी के समानांतर आरोपों और आशंकाओं की एक लहर ने चुनाव की विश्वसनीयता पर कई गंभीर प्रश्न भी खड़े कर दिए। यह चुनाव जहां बीजेपी-जेडीयू के लिए सुनामी बनकर आया, वहीं विपक्ष इसे ‘भारत के इतिहास का सबसे बड़ा वोट स्कैम’ बताने में लगा है। इस आरोप और वास्तविकता के बीच सच्चाई की परतें समझना बेहद जरूरी है।
चुनाव से पहले ही विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) पूरे राजनीतिक विवाद का केंद्र बन चुका था। चुनाव आयोग द्वारा शुरू किए गए इस अभियान का उद्देश्य मतदाता सूची का शुद्धिकरण बताकर पेश किया गया, लेकिन विपक्ष ने इसे सत्ता पक्ष का चुनावी हथियार करार दिया। कांग्रेस और आरजेडी ने आरोप लगाया कि लगभग 80 लाख वोटरों के नाम काटे गए, जिनमें सबसे अधिक दलित, अल्पसंख्यक और विपक्षी इलाकों के मतदाता शामिल थे। हालांकि आयोग ने इन दावों को नकारते हुए कहा कि मतदाता सूची का अंतिम आंकड़ा 7.64 करोड़ से घटकर 7.42 करोड़ आना सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा है। राहुल गांधी के नाम हटाने के विवाद ने इस मुद्दे को और हवा दी, लेकिन EPIC नंबर फर्जी साबित होने के बाद विपक्ष की दलील कमजोर पड़ गई। फिर भी सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो, शिकायतें और हजारों नागरिकों के ‘नाम कटने’ के दावों ने जनता के मन में संशय पैदा कर दिया। क्या SIR निष्पक्ष था या चयनित क्षेत्रों में लागू किया गया? यह सवाल अब भी अनुत्तरित है।
ईवीएम विवाद ने चुनाव को एक और दिशा दे दी। मतगणना के दौरान कई सीटों पर घंटों देरी हुई, VVPAT मिलान के लिए विपक्ष की मांगें ठुकरा दी गईं और कुछ काउंटिंग सेंटर्स पर CCTV फुटेज उपलब्ध नहीं थे। विपक्ष ने इसे धांधली का प्रमाण बताया। कांग्रेस और आरजेडी के नेताओं का आरोप था कि कई बूथों पर ‘प्री-पोल्ड’ EVM मिले और वोटर टर्नआउट के आंकड़े मतगणना से मेल नहीं खा रहे। हालांकि चुनाव आयोग ने इन आरोपों को पूरी तरह खारिज करते हुए कहा कि EVM फुलप्रूफ है और हर प्रक्रिया वीडियो रिकॉर्डिंग में होती है, लेकिन ADR की पूर्व रिपोर्टें, जिनमें वोट-पोल्ड और वोट-काउंटेड के बीच अंतर पाया गया था, लोगों के मन में संशय पैदा करने के लिए काफी थीं। 2025 का चुनाव इस बात का प्रमाण बना कि भारतीय जनता का एक बड़ा वर्ग अब EVM पर अंधविश्वास नहीं रखता। अगर तकनीक पर विश्वास बहाल रखना है, तो पारदर्शिता को और बढ़ाना ही होगा।
इस चुनाव की सबसे विवादास्पद घटनाओं में बेरोज़गार युवाओं, महिलाओं और ग्रामीण गरीबों को चुनाव से ठीक पहले आर्थिक लाभ दिए जाने का मुद्दा भी शामिल रहा। महिला स्वयं सहायता समूहों को 10,000 रुपये की राशि ट्रांसफर की गई, जिसे विपक्ष ने ‘चुनावी रिश्वत’ बताया। दूसरी तरफ एनडीए का तर्क था कि यह सामाजिक कल्याण स्कीम का हिस्सा है और इसे चुनाव से जोड़ना राजनीति का पाखंड है। इसके अलावा, जातिगत समीकरणों का खेल भी दिलचस्प रहा। जहां MY वोट बैंक (मुसलमान-यादव) विपक्ष से थोड़ा खिसका, वहीं गैर-यादव ओबीसी और महादलित समुदायों ने बड़ी संख्या में एनडीए को समर्थन दिया। बिहार में जाति हमेशा सत्ता के समीकरण तय करती रही है; इस बार विकास की राजनीति जाति से ऊपर जाती दिखी, लेकिन पूरी तरह नहीं।
इस चुनाव का सबसे बड़ा निष्कर्ष यही है कि जनता ने स्थिरता, नेतृत्व और बुनियादी सुविधाओं की राजनीति को प्राथमिकता दी। सड़क, बिजली, स्वास्थ्य, महिला-सशक्तिकरण और भ्रष्टाचार-मुक्त प्रशासन को एनडीए की प्रमुख उपलब्धियों के रूप में पेश किया गया और मतदाताओं ने इसे स्वीकार भी किया। लेकिन लोकतंत्र में जीत का अर्थ यह नहीं कि सारे प्रश्न समाप्त हो गए। यदि मतदाता सूची पर आरोप उठ रहे हैं, ईवीएम पर अविश्वास बढ़ रहा है, और मतगणना प्रक्रिया पर सवाल खड़े हो रहे हैं, तो यह केवल विपक्ष की निराशा का परिणाम नहीं, बल्कि भारत के चुनावी सिस्टम में सुधार की आवश्यकता का संकेत है।
भारत का चुनाव आयोग विश्व का सबसे बड़ा चुनावी संस्थान है, लेकिन उसकी विश्वसनीयता पर उठते सवाल भविष्य में लोकतंत्र के लिए खतरा बन सकते हैं। क्योंकि लोकतंत्र सिर्फ़ वोट डालने से नहीं चलता, बल्कि इस विश्वास पर खड़ा होता है कि जो वोट डाला गया, वही गिना भी गया। सुधारों के बिना यह विश्वास टूटता जाएगा। यदि विपक्ष अपने आरोपों में गंभीर है तो कानूनी रास्ता अपनाए, और यदि सत्ता पक्ष वास्तव में पारदर्शिता चाहता है, तो VVPAT की 100% गिनती, मतदाता सूची का स्वतंत्र ऑडिट और SIR प्रक्रिया में निगरानी को सुनिश्चित करे।
2025 का चुनाव एक संदेश देकर गया है — जनता बदलाव चाहती है, लेकिन लोकतंत्र को भी बदलाव की ज़रूरत है। जीत जितनी ऐतिहासिक थी, विवाद भी उतने ही गहरे थे। और लोकतंत्र की मजबूती का रास्ता इन्हीं विवादों के समाधान से होकर गुज़रता है।


