राजस्थान विश्वविद्यालय के छात्रसंघ चुनाव से जुड़े बहुचर्चित मामले में गुरुवार को राजस्थान हाईकोर्ट में लगातार तीसरे दिन सुनवाई हुई। लंबी और विस्तृत सुनवाई के बाद जस्टिस समीर जैन की एकलपीठ ने मामले में अपना फैसला रिजर्व रख लिया है। यह मामला पिछले कई दिनों से सुर्खियों में है, क्योंकि याचिकाकर्ताओं ने विश्वविद्यालय प्रशासन पर लिंगदोह समिति की सिफारिशों और छात्रसंघ चुनाव संबंधी संविधानिक प्रावधानों की अनुपालना न करने का गंभीर आरोप लगाया है।
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता जय राव की ओर से एडवोकेट शांतनु पारीक ने प्रभावी तरीके से पक्ष रखा और अदालत के समक्ष बताया कि विश्वविद्यालय प्रशासन ना तो चुनावों के लिए आवश्यक नियमों का पालन कर रहा है और ना ही सत्र का कैलेंडर वर्षों से समय पर लागू कर रहा है। उन्होंने तर्क रखा कि विश्वविद्यालय का पूरा प्रशासनिक ढांचा अस्त-व्यस्त हो चुका है और चुनाव से संबंधित प्रक्रियाएं लगातार प्रभावित हो रही हैं।
इस दौरान अदालत ने भी सख्त मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा कि “राजस्थान विश्वविद्यालय की स्थिति ऐसी प्रतीत होती है कि वह ‘अर्श से फर्श’ तक का सफर तय कर चुका है।” न्यायालय ने यह भी कहा कि चुनाव संबंधी दिशा-निर्देशों और लिंगदोह समिति की सिफारिशों को लागू करने में विश्वविद्यालय प्रशासन की गंभीरता स्पष्ट रूप से दिखाई नहीं देती। अदालत ने यह सवाल भी उठाया कि आखिर क्यों इतने वर्षों से न तो सत्र कैलेंडर समय पर लागू किया जा रहा है और न ही चुनाव संबंधी संवैधानिक प्रावधानों का पालन हो रहा है।
मामले में न्यायमित्र के रूप में उपस्थित अधिवक्ता अभिनव शर्मा ने पहले ही अपने तर्क प्रस्तुत कर दिए थे। याचिकाकर्ताओं की बहस भी पूरी हो चुकी थी। आज सुनवाई के तीसरे दिन राज्य सरकार की ओर से महाधिवक्ता (AG) राजेंद्र प्रसाद ने अपने पक्ष को कोर्ट में रखा। उन्होंने सरकार की स्थिति स्पष्ट की और कई बिंदुओं पर प्रशासनिक दृष्टिकोण से जवाब दिए।
अंततः सभी पक्षों की बहस पूरी होने के बाद अदालत ने अपना फैसला सुरक्षित (रिजर्व) रख लिया है। अब सभी की नजरें हाईकोर्ट के आने वाले निर्णय पर टिकी हुई हैं, क्योंकि इस फैसले का प्रभाव न केवल राजस्थान विश्वविद्यालय बल्कि प्रदेश के अन्य विश्वविद्यालयों में छात्रसंघ चुनावों की प्रक्रिया पर भी व्यापक रूप से पड़ सकता है।


