बिहार में वोटर लिस्ट की विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया पूरी होने के बाद चुनाव आयोग ने सोमवार को बड़ा फैसला लिया। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में घोषणा की कि अब 12 राज्यों में मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण का दूसरा चरण शुरू किया जाएगा। इनमें राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और पश्चिम बंगाल जैसे बड़े राज्य शामिल हैं।
चुनाव आयोग के इस फैसले के बाद राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। इसी बीच राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने आयोग के इस कदम पर कड़ा रुख अपनाया है। उन्होंने कहा कि जब SIR प्रक्रिया से जुड़ा मामला पहले से ही सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है, तब देश के 12 राज्यों में इसे आगे बढ़ाना उचित नहीं है।
गहलोत ने कहा कि करीब दो दशक पहले भी ऐसी ही प्रक्रिया लागू की गई थी, लेकिन तब किसी ने आपत्ति नहीं जताई थी। हालांकि इस बार चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली ने आम लोगों के मन में संदेह पैदा कर दिया है। उन्होंने आरोप लगाया कि आयोग ने ऐसा माहौल बना दिया है जिससे लोगों को अपने मतदान अधिकार पर शक होने लगा है।
पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा कि भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में मताधिकार हर नागरिक का मूल अधिकार है। उन्होंने कहा कि भारत ने संविधान लागू होने के पहले दिन से ही सभी नागरिकों को यह अधिकार दिया था, जबकि अमेरिका और ब्रिटेन जैसे देशों में महिलाओं और अश्वेतों को मताधिकार पाने में वर्षों लग गए।
गहलोत ने आगे कहा कि SIR प्रक्रिया को लेकर पारदर्शिता और संवेदनशीलता दोनों जरूरी हैं, ताकि किसी भी नागरिक के मन में मताधिकार छिनने का डर न बैठे। उन्होंने चुनाव आयोग से अपील की कि जब तक सुप्रीम कोर्ट का निर्णय नहीं आ जाता, तब तक इस प्रक्रिया को आगे न बढ़ाया जाए।
राजस्थान कांग्रेस नेताओं ने भी गहलोत के रुख का समर्थन किया है और कहा कि यह कदम लोकतांत्रिक अधिकारों को लेकर जनता के बीच भ्रम पैदा कर रहा है। उन्होंने आयोग से प्रक्रिया को स्थगित करने और जनता को स्पष्ट जानकारी देने की मांग की है।
वहीं, चुनाव आयोग का कहना है कि SIR एक नियमित प्रक्रिया है, जो हर साल की तरह इस बार भी पारदर्शी तरीके से की जा रही है। आयोग का दावा है कि इसका उद्देश्य मतदाता सूची को अद्यतन रखना और त्रुटियों को दूर करना है, ताकि चुनाव प्रक्रिया सुचारु रूप से चल सके।
फिलहाल, देशभर में SIR प्रक्रिया को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। विपक्ष जहां इसे मताधिकार से जुड़ा संवेदनशील मुद्दा बता रहा है, वहीं आयोग इसे प्रशासनिक सुधार की दिशा में कदम बता रहा है। अब सबकी नजर सुप्रीम कोर्ट में होने वाली सुनवाई और चुनाव आयोग के अगले कदम पर टिकी है।


