राजस्थान में 28 अक्टूबर 2025 से शुरू हुए विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) कार्यक्रम ने राजनीतिक हलचल मचा दी है। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की 27 अक्टूबर की घोषणा के तहत 12 राज्यों में यह दूसरा चरण चला, जिसमें राजस्थान भी शामिल है। राज्य में 5.48 करोड़ से अधिक मतदाताओं की सूची को फ्रीज कर अद्यतन करने की प्रक्रिया आरंभ हो गई। मुख्य निर्वाचन अधिकारी नवीन महाजन के अनुसार, 70.55 प्रतिशत नामों का पुरानी सूचियों से मिलान हो चुका है, और 70 प्रतिशत से अधिक मतदाताओं को दस्तावेज जमा करने की जरूरत नहीं पड़ेगी। यह प्रक्रिया सतह पर तो लोकतंत्र की मजबूती का प्रतीक लगती है, लेकिन गहराई में यह एक जटिल राजनीतिक खेल का हिस्सा नजर आती है। बिहार में SIR के पहले चरण से उत्पन्न विवादों को देखते हुए, राजस्थान में भी यह प्रक्रिया सवालों के घेरे में है।
SIR की प्रक्रिया: एक विस्तृत अवलोकन
SIR की प्रक्रिया व्यवस्थित और बहु-चरणीय है। 28 अक्टूबर से 3 नवंबर तक फॉर्म प्रिंटिंग और BLO (बूथ लेवल ऑफिसर) प्रशिक्षण चलेगा। इसके बाद 4 नवंबर से 4 दिसंबर तक घर-घर जाकर एन्यूमरेशन फॉर्म (EF) भरवाए जाएंगे। महाजन ने बताया कि BLO तीन बार प्रयास करेंगे; असफल होने पर नोटिस चस्पा कर फॉर्म डाल देंगे। ड्राफ्ट सूची 8 दिसंबर को जारी होगी, दावे-आपत्तियां 9 दिसंबर से 8 जनवरी तक दर्ज होंगी, और सुनवाई 31 जनवरी तक चलेगी। अंतिम सूची 7 फरवरी 2026 को प्रकाशित होगी। QR कोड आधारित EF से डेड वोटर्स, डुप्लीकेट नाम और माइग्रेंट्स की पहचान आसान होगी। पहले 31 दिनों में दस्तावेज-मुक्त फेज रहेगा, जो बिहार के दस्तावेज विवाद से सबक लेता प्रतीत होता है। राज्य में 52,469 BLO तैनात हैं, जो 268 जिलों में कार्य करेंगे। यह प्रक्रिया ऑनलाइन EF सबमिशन को भी सुगम बनाती है, लेकिन ग्रामीण और घुमंतू परिवारों तक पहुंच की चुनौती बरकरार है।
सकारात्मक पहलू: पारदर्शिता और शुद्धता की दिशा में कदम
SIR के सकारात्मक आयाम नकारे नहीं जा सकते। 2002-2005 की पुरानी सूचियों से 70.55 प्रतिशत मिलान से लाखों डुप्लीकेट या मृत नामों की पहचान संभव हुई। महाजन ने स्पष्ट किया कि 70 प्रतिशत से अधिक मतदाताओं को दस्तावेज नहीं जमा करने पड़ेंगे, जो प्रक्रिया को जन-मैत्रीपूर्ण बनाता है। सभी राज्यों की सूचियां ऑनलाइन उपलब्ध होने से सीमा क्षेत्रों में विवाह या प्रवास के बाद नामों का सटीक मिलान हो सकेगा। हटाए गए नाम वेबसाइट पर सार्वजनिक होंगे, और अपील का प्रावधान – कलेक्टर से मुख्य निर्वाचन अधिकारी तक – न्याय सुनिश्चित करता है। बिहार में SIR से 7.5 करोड़ मतदाताओं की भागीदारी ने लाखों त्रुटियां सुधारीं, जो राजस्थान के लिए मॉडल है। यह प्रक्रिया नए वोटरों (18-19 वर्ष) को जोड़ने और महिलाओं (49 प्रतिशत) की भागीदारी बढ़ाने का अवसर देगी। कुल मिलाकर, SIR मतदाता सूची को डिजिटल युग के अनुरूप बनाने की दिशा में एक आवश्यक कदम है।
नकारात्मक प्रभाव: नाम कटने का खतरा और सामाजिक असर
हालांकि सकारात्मक दिखने वाली यह प्रक्रिया नकारात्मक प्रभावों से परिपूर्ण है। बिहार में SIR से 65 लाख नाम कटे, जिससे गरीब, प्रवासी और अल्पसंख्यक वोटर सबसे अधिक प्रभावित हुए। राजस्थान में भी 29.45 प्रतिशत शेष नामों का मिलान प्रक्रिया में देरी या त्रुटि से नाम कट सकते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में, जहां 70 प्रतिशत मतदाता हैं, BLO की पहुंच सीमित होने से घुमंतू परिवार वंचित रह सकते हैं। महिलाओं और बुजुर्गों के लिए EF भरना जटिल हो सकता है, खासकर डिजिटल साक्षरता की कमी के कारण। दस्तावेज-मुक्त फेज के बावजूद, संदिग्ध मामलों में दस्तावेज मांगना विवादास्पद रहेगा। पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु जैसे राज्यों में SIR को NRC का पूर्वाभास माना जा रहा है, जो राजस्थान के आदिवासी और गरीब वोटरों को प्रभावित कर सकता है। कुल 5.48 करोड़ मतदाताओं में से यदि 5-10 प्रतिशत नाम कटते हैं, तो लाखों पात्र नागरिक वोट से वंचित हो जाएंगे।
राजनीतिक संदर्भ: BJP का लाभ और विपक्ष का विरोध
राजस्थान में SIR का राजनीतिक आयाम गहरा है। भाजपा शासित राज्य होने के नाते, यह प्रक्रिया सत्ताधारी दल के हित में नजर आती है। उपमुख्यमंत्री दीया कुमारी ने SIR का स्वागत किया, कहते हुए कि इससे वोटर सूची में विसंगतियां दूर होंगी। लेकिन विपक्ष, खासकर कांग्रेस, इसे ‘वोट चोरी’ की साजिश बता रहा है। केंद्रीय स्तर पर कांग्रेस ने EC की निष्पक्षता पर सवाल उठाए, दावा किया कि SIR BJP का कठपुतली है। बिहार में SIR से विपक्षी वोटरों के नाम अधिक कटे, जो राजस्थान में दोहराया जा सकता है। मीणा, गुर्जर और मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में नाम कटने से कांग्रेस का वोटबैंक प्रभावित होगा। X (पूर्व ट्विटर) पर #SIR विवादास्पद है, जहां BJP कार्यकर्ता इसे ‘शुद्धिकरण’ बता रहे हैं, जबकि विपक्ष ‘लोकतंत्र हत्या’। तमिलनाडु CM स्टालिन ने BJP-AIADMK पर नाम हटाने का आरोप लगाया, जो राजस्थान के संदर्भ में प्रासंगिक है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: 21 वर्ष बाद SIR का महत्व
SIR 21 वर्ष बाद हो रहा है, जो 2003-04 के बाद पहली बार है। राजस्थान में 2023 विधानसभा चुनावों में 80 प्रतिशत से अधिक मतदान हुआ, लेकिन डुप्लीकेट नामों की समस्या बनी रही। बिहार के सफल मॉडल को अपनाने से EC का इरादा अच्छा लगता है, लेकिन समयबद्धता संदिग्ध है। 2026 में राज्य में स्थानीय निकाय चुनाव हैं, और SIR का फरवरी प्रकाशन चुनावों से ठीक पहले नाम कटने का खतरा पैदा करेगा। राष्ट्रीय स्तर पर, 51 करोड़ वोटरों का कवरेज महत्वाकांक्षी है, लेकिन असम जैसे राज्यों को छोड़ना राजनीतिक पूर्वाग्रह दर्शाता है। राजस्थान में 40 वर्ष से अधिक आयु के 2.61 करोड़ मतदाताओं का 77 प्रतिशत मैपिंग हो चुका है, लेकिन युवा वोटरों (8,540 नए) की जोड़ की प्रक्रिया धीमी हो सकती है। ऐतिहासिक रूप से, ऐसी प्रक्रियाएं सत्ताधारी दलों को लाभ पहुंचाती रही हैं।
संभावित चुनौतियां: कार्यान्वयन की बाधाएं
SIR के कार्यान्वयन में कई चुनौतियां हैं। राजस्थान के 268 जिलों में BLO की कमी या प्रशिक्षण की अपर्याप्तता से देरी हो सकती है। मानसून के बाद भी सर्दी में घर-घर सर्वे कठिन होगा। ऑनलाइन EF सुविधा शहरी क्षेत्रों तक सीमित रह सकती है, जबकि ग्रामीण 70 प्रतिशत आबादी प्रभावित होगी। डुप्लीकेट नाम हटाने का प्रावधान (एक वर्ष की सजा) सख्त है, लेकिन अपील प्रक्रिया जटिल। घुमंतू और प्रवासी परिवारों तक पहुंच के लिए विशेष अभियान जरूरी, अन्यथा वंचना बढ़ेगी। बिहार में 90 हजार BLO ने सफलता पाई, लेकिन राजस्थान में 52 हजार BLO पर दबाव अधिक होगा। यदि नाम कटने की शिकायतें बढ़ीं, तो अदालती हस्तक्षेप संभव है।
नकारात्मक निर्णय का BJP के पक्ष में प्रभाव
कुल मिलाकर, SIR राजस्थान के लोकतंत्र को मजबूत करने का दावा करता है, लेकिन इसकी नकारात्मक निर्णय प्रक्रिया – नाम कटना, दस्तावेज विवाद और असमान कार्यान्वयन – BJP के पक्ष में सिद्ध होगी। लाखों गरीब, अल्पसंख्यक और विपक्षी वोटरों के नाम कटने से कांग्रेस जैसी पार्टियां कमजोर पड़ेंगी, जबकि BJP का संगठनात्मक नेटवर्क नाम जोड़ने में सक्रिय रहेगा। जनता के खिलाफ यह प्रक्रिया वोट का अधिकार छीनकर सत्ता को मजबूत करेगी। यदि EC निष्पक्ष नहीं रही, तो 2026 चुनाव पूर्वाग्रहित होंगे। जनता को सतर्क रहना चाहिए, अन्यथा SIR ‘शुद्धिकरण’ के नाम पर ‘शोषण’ बन जाएगा।


