जयपुर में हड़कंप! राजस्थान का 30 साल पुराना कानून रातों-रात रद्द, लाखों की जिंदगी पलटने वाली खबर!

राजस्थान सरकार पंचायती राज और नगर निकाय चुनावों से ‘दो बच्चे’ की शर्त हटाने की तैयारी में, यह फैसला जनसांख्यिकीय और सामाजिक बदलाव की ओर संकेत।

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राजस्थान, वह भूमि जहां रेगिस्तानी हवाओं में इतिहास की गूंज सुनाई देती है, अब एक ऐसे बदलाव की दहलीज पर खड़ा है जो न केवल स्थानीय राजनीति को नया रूप देगा, बल्कि राज्य की जनसांख्यिकीय संरचना पर गहरा प्रभाव डालेगा। राज्य सरकार द्वारा पंचायती राज और नगर निकाय चुनावों से ‘दो बच्चे’ की अनिवार्यता हटाने की तैयारी एक साधारण कानूनी संशोधन से कहीं अधिक है। यह एक अनदेखा परिप्रेक्ष्य है – जहां यह फैसला न केवल राजनीतिक समावेशिता को बढ़ावा देगा, बल्कि दशकों से चली आ रही लिंग असंतुलन की समस्या को सुधारने की दिशा में एक अप्रत्याशित कदम साबित हो सकता है। जबकि मीडिया घराने इस फैसले को मुख्यतः चुनावी रणनीति या ग्रामीण प्रभाव के चश्मे से देख रहे हैं, हम यहां इसे जनसांख्यिकीय लाभांश के रूप में विश्लेषित करेंगे: कैसे यह नीति हटाना राजस्थान की गिरती बाल लिंग अनुपात को संतुलित कर सकता है और ग्रामीण नेतृत्व को अधिक प्रतिनिधित्वपूर्ण बना सकता है।

1995 का कानून और उसकी जड़ें

राजस्थान में ‘दो बच्चे’ का नियम 1995 से लागू है, जब भैरों सिंह शेखावत के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार ने इसे पेश किया था। इस कानून के तहत, यदि किसी व्यक्ति का तीसरा बच्चा 27 नवंबर 1995 के बाद जन्मा है, तो वह पंच, सरपंच, पंचायत समिति सदस्य, जिला परिषद सदस्य, प्रधान, जिला प्रमुख, पार्षद, सभापति या महापौर जैसे पदों के लिए अयोग्य हो जाता है। यह प्रावधान राजस्थान नगर निगम अधिनियम की धारा 24 और राजस्थान पंचायती राज अधिनियम में निहित है। शुरू में जनसंख्या नियंत्रण के उद्देश्य से लाया गया यह नियम, वास्तव में ग्रामीण समाज की वास्तविकताओं से मेल नहीं खाता। अध्ययनों से पता चलता है कि ऐसे नियमों ने न केवल जन्म दर को कम किया, बल्कि बाल लिंग अनुपात को और बिगाड़ा है, क्योंकि परिवार लड़कियों की बजाय लड़कों को प्राथमिकता देते हुए चयनात्मक गर्भपात की ओर मुड़ते हैं। राजस्थान में, जहां बाल लिंग अनुपात राष्ट्रीय औसत से नीचे है (लगभग 888 लड़कियां प्रति 1000 लड़के), यह नीति अप्रत्यक्ष रूप से लिंग भेदभाव को बढ़ावा देती रही है।

र्तमान विकास: अध्यादेश की राह

अब, भजनलाल शर्मा सरकार इस 30 वर्ष पुरानी नीति को समाप्त करने की दिशा में तेजी से बढ़ रही है। पंचायती राज विभाग ने मसौदा तैयार कर विधि विभाग को भेज दिया है, जहां से अनुमोदन के बाद यह कैबिनेट में जाएगा और फिर राज्यपाल की मंजूरी से अध्यादेश के रूप में लागू होगा। शहरी विकास मंत्री झाबर सिंह खर्रा ने कहा है कि निर्वाचित प्रतिनिधियों के साथ दो-बच्चा नियम के कारण भेदभाव नहीं होना चाहिए। यह फैसला भाजपा और कांग्रेस दोनों दलों के कई नेताओं को लाभ पहुंचाएगा, जो पहले अयोग्य घोषित हो चुके थे। दिलचस्प बात यह है कि तेलंगाना ने हाल ही में (अक्टूबर 2025) इसी तरह का फैसला लिया, जहां पंचायत राज अधिनियम 2018 और नगरपालिका अधिनियम में संशोधन कर नीति हटाई गई। राजस्थान का कदम अन्य राज्यों के लिए प्रेरणा बन सकता है, विशेषकर मध्य प्रदेश जैसे क्षेत्रों में जहां यह नीति गरीबों को दंडित करती है और लिंग असमानता को गहरा करती है।

अनदेखा परिप्रेक्ष्य: जनसांख्यिकीय संतुलन और सामाजिक न्याय

जबकि मुख्यधारा की खबरें इस फैसले को ग्रामीण राजनीति में ‘बड़ा असर’ या महिला जनप्रतिनिधियों के लिए ‘राहत’ के रूप में देख रही हैं, हम इसे एक गहरे जनसांख्यिकीय लाभांश के रूप में विश्लेषित करते हैं। अध्ययनों से साबित होता है कि दो-बच्चा नीति ने राजनीतिक भागीदारी को सीमित कर दलित, आदिवासी और महिलाओं को सबसे अधिक प्रभावित किया है। राजस्थान के ग्रामीण इलाकों में, जहां परिवार नियोजन की जागरूकता कम है, कई सक्षम महिलाएं चुनाव से वंचित रहीं। इस नीति को हटाने से न केवल अधिक महिलाएं राजनीति में आएंगी, बल्कि यह लिंग चयनात्मक गर्भपात को कम कर सकता है। शोध बताते हैं कि ऐसी नीतियां जन्म दर तो घटाती हैं, लेकिन बाल लिंग अनुपात को बिगाड़ती हैं, क्योंकि परिवार ‘परफेक्ट फैमिली’ (दो लड़के) के लिए जोखिम उठाते हैं। राजस्थान, जहां जल संकट और संसाधन सीमित हैं, में बड़े परिवारों का प्रतिनिधित्व बेहतर नीतियां ला सकता है – जैसे सामुदायिक जल प्रबंधन या सतत विकास। यह फैसला संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्यों (एसडीजी) से जुड़ता है, विशेषकर लिंग समानता और समावेशी समाज के।

सामाजिक संगठनों ने लंबे समय से इसकी मांग की थी, इसे ‘कालातीत और भेदभावपूर्ण’ बताते हुए। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह सरकार की रणनीति है, जो आगामी चुनावों में ग्रामीण मतदाताओं को आकर्षित करेगी। लेकिन अनदेखा पहलू यह है कि इससे राजस्थान की जनसंख्या नीति अधिक मानवीय बनेगी, जहां व्यक्तिगत स्वतंत्रता और परिवार के अधिकारों को प्राथमिकता मिलेगी। पॉपुलेशन फाउंडेशन ऑफ इंडिया जैसे संगठन कहते हैं कि दो-बच्चा नीति की प्रभावशीलता कभी साबित नहीं हुई।

एक नई दिशा की ओर

यह फैसला राजस्थान के लोकतंत्र को विस्तार देगा, जहां कोई भी सामाजिक या पारिवारिक कारण से वंचित न रहे। लेकिन इसका असली मूल्य जनसांख्यिकीय संतुलन में छिपा है – एक ऐसा लाभांश जो लिंग असमानता को कम कर, राज्य को अधिक समृद्ध और न्यायपूर्ण बना सकता है। क्या यह बदलाव राजस्थान की रेतीली धरती पर नई हरियाली लाएगा? समय बताएगा, लेकिन यह निश्चित है कि यह फैसला इतिहास के पन्नों में एक अनोखी कहानी लिखेगा।

आर्यन जाखड़
आर्यन जाखड़http://politicsheadline.in
आर्यन जाखड़ एक राजनीतिक और व्यापारिक समाचार लेखक हैं, जो भारतीय शासन, चुनाव और आर्थिक रुझानों पर अपनी सटीक विश्लेषणात्मक रिपोर्टिंग के लिए जाने जाते हैं। आर्यन जाखड़, पॉलिटिक्स हैडलाइन के प्रधान संपादक हैं।

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