भारत की सबसे बड़ी एयरलाइन इंडिगो का चार दिन तक चला भीषण संकट, जिसने लाखों यात्रियों को हवाई अड्डों पर भटकने पर मजबूर कर दिया, शनिवार को अचानक शांत होता दिखाई दिया। इंडिगो ने दावा किया कि उसके 95% रूट्स पर उड़ानें बहाल हो चुकी हैं और 138 में से 135 डेस्टिनेशन के लिए उड़ानें दोबारा शुरू कर दी गई हैं। इतना ही नहीं, एयरलाइन ने यह भी आश्वासन दिया कि जिन यात्रियों की उड़ानें रद्द हुई थीं, उन्हें रविवार रात 8 बजे तक रिफंड मिल जाएगा। लेकिन सवाल यह है कि इतना बड़ा संकट, जिसकी वजह से देशभर में एविएशन सिस्टम चरमरा गया था, आखिर चार दिनों में कैसे “जादुई” तरीके से समाप्त हो गया?
कहानी तभी और दिलचस्प हो जाती है जब हम देखते हैं कि ठीक उसी दिन केंद्र सरकार ने अचानक सभी घरेलू उड़ानों के लिए किराया कैप लागू कर दिया।
नए फेयर स्लैब के अनुसार दूरी के मुताबिक किराया तय किया गया है
0–500 किमी तक अधिकतम किराया ₹7,500,
500–1000 किमी तक ₹12,000,
1000–1500 किमी तक ₹15,000 और
1500 किमी से ज्यादा दूरी पर अधिकतम ₹18,000
बिज़नेस क्लास को इस नियम के दायरे से बाहर रखा गया है। अब बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि यह फैसला यात्रियों को राहत देने के लिए लिया गया या फिर संकट से जूझ रही एयरलाइन को नियंत्रित नुकसान के साथ रास्ता देने के लिए? क्या यह कदम एयरलाइन की राजस्व गिरावट को सीमित करने का एक “सॉफ्ट बैलेंसर” है, या यह असल में यात्रियों के हित में उठाया गया कदम है?
इंडिगो का दावा तो यह है कि उसके ऑपरेशन लगभग सामान्य हो चुके हैं, लेकिन हकीकत कुछ और दिखाई देती है। देश के प्रमुख एयरपोर्ट्स—दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु और चेन्नई—पर शनिवार को भी 800 से अधिक उड़ानें रद्द हुईं। सामान्य दिनों में इंडिगो करीब 2300 उड़ानें संचालित करती है, लेकिन शनिवार को केवल 1500 उड़ानें ही उड़ सकीं। इसका सीधा अर्थ यह है कि अभी भी लगभग 35% उड़ानें प्रभावित हैं। ऐसे में 95% बहाली का दावा कितना सटीक है, यह सवाल उठना लाजमी है। क्या यह सिर्फ सांख्यिकीय गणित का खेल है, या फिर जनता और निवेशकों को शांत करने की कोशिश?
इस पूरे संकट की जड़ कहीं न कहीं DGCA द्वारा 1 नवंबर से लागू किए गए FDTL (Flight Duty Time Limitation) के नए नियमों में छिपी है। इन नियमों के दूसरे चरण में पायलट और केबिन क्रू के आराम के समय को बढ़ा दिया गया, जो सुरक्षा की दृष्टि से एक आवश्यक सुधार था। लेकिन इससे इंडिगो के सामने सबसे बड़ी चुनौती खुलकर सामने आई—पायलटों और क्रू मेंबर्स की गंभीर कमी। नए नियमों के चलते एयरलाइन के पास पर्याप्त स्टाफ नहीं बचा जिससे वह अपने नियमित शेड्यूल को संभाल सके। नतीजा—चार दिनों में हज़ारों उड़ानें रद्द, लाखों लोग फंसे और देश की सबसे बड़ी एयरलाइन लगभग ठप।
और फिर अचानक DGCA ने 10 फरवरी 2026 तक के लिए वीकली रेस्ट अनिवार्यता पर अस्थायी ढील दे दी। यह वही नियम था जिसे कुछ सप्ताह पहले यात्रियों की सुरक्षा के लिए बेहद जरूरी बताया जा रहा था।
अब उठ रहे हैं कुछ सवाल – जानिए क्या है सवाल
क्या सुरक्षा अब कम महत्वपूर्ण हो गई है? क्या इंडिगो की स्थिति इतनी गंभीर थी कि DGCA को अपने ही बनाए नियमों को तुरंत ढीला करना पड़ा? क्या इंडिगो की लॉबिंग इस संकट को मोड़ने में बड़ी वजह बनी? और सबसे बड़ा प्रश्न—अगर नियम ढीले किए जा सकते हैं, तो पहले क्यों नहीं किए गए?
यात्रियों के गुस्से ने अब चरम रूप ले लिया है। चार दिन तक लोग एयरपोर्ट पर भटकते रहे, कई यात्रियों की कनेक्टिंग फ्लाइट्स छूट गईं, कई को होटल या खाने का खर्च खुद उठाना पड़ा। रिफंड को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं—कई यात्रियों का कहना है कि उन्हें पूरा पैसा अभी तक नहीं मिला। कुछ लोगों ने यह सवाल भी उठाया कि जब DGCA का नया नियम महीनों पहले घोषित किया गया था, तब इंडिगो ने पायलटों और क्रू की भर्ती समय से क्यों नहीं की? आखिर यह संकट अचानक कैसे फट पड़ा?
विशेषज्ञों का इस मुद्दे पर क्या कहना है – जानिए
विशेषज्ञों का कहना है कि यह सिर्फ इंडिगो का संकट नहीं है बल्कि पूरे भारतीय एविएशन सिस्टम की असली स्थिति का खुलासा है। बढ़ती मांग, महंगा परिचालन, सीमित स्लॉट, घटता स्टाफ और बढ़ते नियम—इन सबके बीच एयरलाइंस पहले से ही दबाव में काम कर रही थीं। इंडिगो का संकट केवल पहला बड़ा फ्यूज था जो उड़ गया; बाकी सिस्टम भी इसी दबाव में चरमराता हुआ नजर आ रहा है।
हालांकि सरकार यह दावा कर सकती है कि किराया कैप यात्रियों के हित में लगाया गया, लेकिन इसका दूसरा पहलू भी है। किराया कैप एयरलाइंस की कमाई सीमित करता है, और यदि कमाई कम होती है तो नुकसान की भरपाई कहां से होगी? क्या भविष्य में टैक्सपेयर्स पर इसका बोझ डालने की नौबत आएगी? या फिर एयरलाइंस को राहत देने के लिए अन्य रास्ते खोजे जाएंगे? यह सवाल अभी भी अनुत्तरित हैं।
आख़िर क्या है सच ?
सच यह है कि इंडिगो का संकट अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ। यह संभव है कि अगले कुछ दिनों तक और उड़ानें रद्द हों, ऑपरेशंस प्रभावित रहें, और यात्रियों को असुविधा झेलनी पड़े। DGCA की अस्थायी राहत केवल एक तात्कालिक समाधान है, स्थायी नहीं। अगर स्टाफ की कमी दूर नहीं की गई, और नियमों तथा क्षमता के बीच संतुलन नहीं बनाया गया, तो यह संकट फिर लौट सकता है—और शायद और बड़े रूप में।
आखिरकार जनता अब सिर्फ यह नहीं पूछ रही कि उड़ानें कब शुरू होंगी, बल्कि यह भी जानना चाहती है कि संकट असल में हुआ क्या। इंडिगो और सरकार के बीच आखिर क्या चल रहा है? कौन किस पर दबाव डाल रहा है? और सबसे महत्वपूर्ण—क्या यात्रियों की सुरक्षा और सुविधा वास्तव में सर्वोच्च प्राथमिकता है, या यह केवल कागज़ों में लिखी हुई बातें हैं?
भारत की हवाई सेवाओं का भविष्य इन सवालों के जवाब पर निर्भर करता है। अभी के लिए तस्वीर साफ है—संकट को अस्थायी रूप से ढक दिया गया है, खत्म नहीं किया गया है।


