राजस्थान की सड़कें आज किसी तकनीकी प्रगति या विकास के कारण नहीं, बल्कि लगातार बढ़ती दुर्घटनाओं और मौतों के कारण सुर्खियों में हैं। हर सुबह किसी नए हादसे की खबर आती है और हर शाम एक परिवार किसी अपने को खोने के बाद ग़म में डूब जाता है। यह सिलसिला नया नहीं है, लेकिन जिस रफ्तार से हादसों के आंकड़े बढ़ रहे हैं, वह पिछले 10–12 वर्षों की तुलना में कहीं अधिक भयावह है। और यही वह दर्दनाक सच है, जिसने राजस्थान की राजनीति, प्रशासन और आम जनता के बीच गंभीर बहस को जन्म दिया है।
अगर कोई इन आंकड़ों को गौर से देखे तो यह साफ़ दिखाई देता है कि भजनलाल शर्मा सरकार के ढाई साल में सड़क दुर्घटनाओं और मृत्यु दर की स्थिति न सिर्फ़ कांग्रेस शासन से बदतर हुई है, बल्कि भाजपा की ही पूर्व वसुंधरा राजे सरकार (2014–2018) के मुकाबले भी कहीं अधिक खराब हुई है। आंकड़े कागज पर शांत दिखते हैं, लेकिन असल में वे उन परिवारों की चीखें हैं, जो अचानक आए हादसे में हमेशा के लिए बिखर गए।
बेहतर तुलना के लिए इन तीन अवधियों के बीच आंकड़े सामने रखे जाएं तो पूरे मामले की गंभीरता और साफ़ समझ में आती है।
राजस्थान में सड़क हादसे और मौतों की तुलना (2014–2025)
| पैरामीटर | भाजपा सरकार (2014 – नव 2018) | कांग्रेस सरकार (दिस 2018 – दिस 2023) | भाजपा सरकार – भजनलाल शर्मा (दिस 2023 – नव 2025) |
|---|---|---|---|
| सालाना औसत सड़क हादसे | 19,500 – 21,000 | 20,500 – 22,000 (कोविड वर्षों को छोड़कर) | 24,000 – 26,000 (2024–25 अनुमानित) |
| सालाना औसत मौतें | 9,800 – 10,500 | 10,200 – 10,800 | 11,500 – 12,000+ (2024 में 11,762; 2025 में नवंबर तक 10,000+) |
| नेशनल हाईवे पर मौतों का प्रतिशत | 28–30% | 29–31% | 35–38% |
| दोपहिया वाहनों से होने वाली मौतें | 38–40% | 41–43% | 44–47% |
| ओवरस्पीडिंग के कारण हादसे (%) | 58–62% | 64–68% | 70–74% |
| ब्लैक स्पॉट सुधार कार्य | 2015–18 में 450+ सुधारे | 2019–23 में सिर्फ़ 180 | 176 नए चिह्नित, 650 करोड़ मंजूर — 30% काम ही पूरा |
| सड़क निर्माण की गति | मध्यम | धीमी | बहुत तेज़ — 6 से 8 लेन हाईवे का विस्तार |
| ट्रैफिक पुलिस बल में वृद्धि | +4,500 पद | लगभग शून्य | 2025 तक सिर्फ 1,200 नए पद |
इस तालिका की हर पंक्ति मानो यह कह रही है कि सड़क संरचना आधुनिक हो रही है, लेकिन सुरक्षा व्यवस्था पिछड़ रही है। सड़कें जितनी चौड़ी हुई हैं, हादसों का दायरा भी उतना ही बढ़ गया है। यही वजह है कि इस पूरे घटनाक्रम को केवल संयोग कहना एक बड़ी भूल होगी।
2014 से 2018 तक वसुंधरा राजे के नेतृत्व में जो विकास हुआ, उसमें संतुलन था। सड़कें बन रही थीं, लेकिन सड़क सुरक्षा नीति भी उतनी ही मजबूत की जा रही थी। ब्लैक स्पॉट हटाने का काम लगातार जारी रहा, और ट्रैफिक पुलिस की भर्ती व प्रशिक्षण पर भी पर्याप्त ध्यान दिया गया। दुर्घटनाएँ होती थीं, लेकिन नियंत्रित थीं। राज्य की जनता महसूस करती थी कि विकास हो रहा है, लेकिन उसकी कीमत उनकी जान नहीं है।
इसके विपरीत, 2018 से 2023 तक अशोक गहलोत का दौर सड़क सुरक्षा के लिहाज से सबसे स्थिर रहा। यह स्थिरता सरकार की किसी खास नीति का परिणाम कम और उनकी धीमी विकास गति का अप्रत्यक्ष लाभ अधिक थी। नए हाईवे प्रोजेक्ट कम थे, सड़कें उतनी तेज़ी से नहीं बढ़ रहीं थीं, और पुलिस का ध्यान भी तमाम राजनीतिक मुद्दों के कारण प्रशासनिक कार्यों पर अधिक था। फिर भी दुर्घटनाओं का आंकड़ा लगभग स्थिर रहा। यह “अनचाही सुरक्षा” थी — विकास धीमा, इसलिए हादसे भी नियंत्रित।
लेकिन दिसंबर 2023 में जैसे ही भजनलाल शर्मा की सरकार आई, मानो किसी ने पूरे राज्य में विकास की रफ्तार को हाई-स्पीड गियर में डाल दिया। दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेसवे, अमृतसर-जामनगर कॉरिडोर, नए ग्रीनफील्ड हाईवे, और 35 लाख करोड़ के निवेश समझौते — सब एक साथ जमीन पर उतरने लगे। इस तेजी की चमक में प्रशासन और सरकार दोनों सुरक्षा के बुनियादी ढांचे को मजबूत करने में पिछड़ गए।
राजस्थान में आज हाईवे छह-आठ लेन के हैं, लेकिन उन पर चलने वालों को नियंत्रित करने के लिए न पर्याप्त पुलिस है, न स्पीड सर्विलांस सिस्टम, न पर्याप्त सिग्नल, न स्मार्ट ट्रैफिक प्रबंधन। परिणामस्वरूप हादसे बढ़ते चले गए। ओवरस्पीडिंग अब 70% से अधिक मामलों में मुख्य कारण है। यह सिर्फ लापरवाही नहीं, बल्कि सिस्टम की कमियों का साफ संकेत है।
सबसे चिंता की बात यह है कि अब भी सरकार का ध्यान हादसों के बाद योजनाओं में उलझा हुआ है। 2025–2035 के लिए रोड सेफ्टी एक्शन प्लान की घोषणा की गई है, 176 ब्लैक स्पॉट पर 650 करोड़ खर्च करने की मंजूरी दी गई है, और दिसंबर 2025 में 15 दिन का अभियान भी चलाया गया। यह सब स्वागतयोग्य है, लेकिन देर से लिया गया फैसला अक्सर उतना प्रभावी नहीं होता जितना होना चाहिए।
भजनलाल शर्मा सरकार का पूरा ध्यान विकास को गति देने पर है, लेकिन उस विकास की रफ्तार सड़क सुरक्षा को कुचलती जा रही है। असल समस्या यह है कि हाईवे आधुनिक हो गए हैं, पर ट्रैफिक सिस्टम अब भी 2018 जैसा ही है। रोड इंजीनियरिंग बदली, लेकिन रोड डिसिप्लिन नहीं बदला।
राजस्थान की जनता दो हिस्सों में बटी दिखाई देती है। एक हिस्सा नई सड़कों, नई परियोजनाओं और तेज़ी से बढ़ते औद्योगीकरण को विकास की जीत मानता है। दूसरा हिस्सा हर रोज़ किसी सड़क दुर्घटना में अपने परिजन को खोकर सोचता है कि विकास की यह कीमत असहनीय है। इन दोनों भावनाओं की टकराहट ही आज राजस्थान की सड़कें झेल रही हैं।
दरअसल सच्चाई यही है कि हादसे सिर्फ ड्राइवर की गलती से नहीं होते। हादसे सिस्टम से भी होते हैं — कमजोर पुलिसिंग, अपर्याप्त सिग्नलिंग, टूटी रोड सेफ्टी संरचनाएँ, रात में रोशनी की कमी, लापरवाह ट्रकिंग कंपनियाँ, और भ्रष्ट माइनिंग व परिवहन नेटवर्क — ये सब मिलकर मौत का ताना-बाना बुनते हैं।
अगर राजस्थान को अपनी सड़कों पर घट रही मौतों के सिलसिले को रोकना है, तो भजनलाल शर्मा को अपनी ही पूर्व भाजपा सरकार के मॉडल से सीख लेनी होगी। पहले सुरक्षा, फिर गति – यही संतुलन जरूरी है। पुलिस बल को तीन गुना बढ़ाना होगा, हाईवे पेट्रोलिंग आधुनिक करनी होगी, स्पीड कैमरे अनिवार्य करने होंगे, और स्कूल स्तर पर रोड सेफ्टी शिक्षा को लागू करना होगा।
सड़कें विकास लाती हैं, लेकिन सड़कें मौत भी ला सकती हैं – यह दोनों बातें समान रूप से सत्य हैं। और जब मौतें विकास की रफ्तार से भी अधिक रफ्तार से बढ़ने लगें, तो यह समझना चाहिए कि सिस्टम में कुछ बहुत बड़ा असंतुलन आ चुका है।
राजस्थान की सड़कें आज यही कह रही हैं – “रफ्तार अच्छी है, लेकिन इसकी कीमत जान नहीं होनी चाहिए।”
और यह संदेश सरकार, प्रशासन और समाज—तीनों को मिलकर समझना होगा। नहीं तो आने वाले दिनों में राजस्थान की चमचमाती सड़कें सिर्फ़ शोक-सूचनाओं से भरती रहेंगी।


