राजस्थान की राजनीति आज एक निर्णायक मोड़ पर है, और इसकी सबसे अहम पटकथा लिखी जा रही है बारां जिले के अंता विधानसभा क्षेत्र में। 11 नवंबर को होने वाला यह उपचुनाव राज्य की सियासत पर बड़ा असर डाल सकता है। प्रचार थम चुका है, शोर शांत है, लेकिन मतदाताओं के मन में सवालों और समीकरणों की हलचल अभी भी जारी है। राजनीतिक पर्यवेक्षक मानते हैं कि यह उपचुनाव केवल उम्मीदवारों का नहीं, बल्कि भाजपा और कांग्रेस दोनों के लिए परीक्षण की घड़ी है।
भाजपा की उम्मीदें और कांग्रेस की मजबूती
भाजपा ने युवा और स्थानीय नेताओं पर भरोसा जताते हुए मोरपाल सुमन को मैदान में उतारा है। सुमन जिला प्रशासन और स्थानीय इकाइयों में पहचान बनाने में सफल रहे हैं, और पार्टी उनके माध्यम से ‘नए नेतृत्व’ की छवि पेश करना चाहती है। भाजपा का दावा है कि प्रदेश में पार्टी संगठन की पकड़ मजबूत हो रही है और अंता जैसे उपचुनाव नतीजे इस दावे को मजबूत कर सकते हैं।
वहीं कांग्रेस ने अपने मजबूत और अनुभवी कार्ड प्रमोद जैन भाया को फिर से मौका देकर ‘स्थिरता बनाम बदलाव’ की लड़ाई को हवा दी है। भाया इस क्षेत्र में लंबे समय से सक्रिय रहे हैं और उनका व्यक्तिगत वोट बैंक अब भी काफी प्रभावशाली है। उनके समर्थक ग्रामीण इलाकों में मजबूत माने जाते हैं, जहां उनका सीधा ताल्लुक़ मतदाताओं से है। कांग्रेस की रणनीति रही है कि पिछले शासनकाल के अधूरे कामों को फिर से एजेंडा बनाया जाए।
दोनों दलों के बीच यह सीधी भिड़ंत अब हर मोहल्ले और चौपाल की चर्चा बन गई है। भाजपा विकास और संगठन को आधार बना रही है, जबकि कांग्रेस परंपरा और भरोसे पर दांव खेल रही है।
निर्दलीय उम्मीदवार का खेल बिगाड़ने वाला असर
चुनावी तस्वीर में सबसे दिलचस्प मोड़ निर्दलीय उम्मीदवार नरेश मीणा की एंट्री से आया है। वे भले ही किसी बड़े दल से नहीं हैं, लेकिन स्थानीय स्तर पर उनकी पकड़ ने मुकाबले को त्रिकोणीय बना दिया है। नरेश मीणा भाजपा से असंतुष्ट गुट का प्रतिनिधित्व करते हैं और क्षेत्र के मीणा वर्ग में उनकी लोकप्रियता अपेक्षाकृत अधिक है। उनके चुनाव प्रचार में सीमित संसाधन हैं, लेकिन मुद्दों पर तीखे प्रश्न और स्थानीय असंतोष का उपयोग उनकी ताकत बन गए हैं।
कई जानकार मानते हैं कि यदि मीणा का वोट प्रतिशत थोड़ा भी बढ़ा, तो यह भाजपा और कांग्रेस दोनों के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकता है। उनके समर्थन से किसी भी पारंपरिक वोट बैंक में सेंध लगना तय है, और यही अनिश्चितता इस चुनाव को रोमांचक बनाए हुए है।
संतुलन की तलाश और संभावित विजेता
अंता विधानसभा की राजनीति में जातीय और सामाजिक समीकरणों का असर हमेशा से निर्णायक रहा है। यहां जैन, मीणा और गुर्जर समुदाय के मतदाता संतुलन का कार्य करते हैं। कांग्रेस इन समूहों में अपने पुराने संबंधों पर भरोसा कर रही है, जबकि भाजपा नए मतदाताओं तक पहुंच बनाने में जुटी है। ग्रामीण इलाकों में आर्थिक मुद्दे और स्थानीय विकास सबसे महत्वपूर्ण विषय बने हुए हैं। वहीं, शहरी मतदाता प्रशासनिक छवि और स्थिर नेतृत्व को प्राथमिकता दे रहे हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों की राय में मुकाबला कांटे का है। भाजपा का संगठनात्मक ढांचा मजबूत है और यदि मतदान प्रतिशत ऊंचा रहा तो सत्ताधारी दल को फायदा मिल सकता है। कांग्रेस की ओर से स्थानीय जुड़ाव और भाया की व्यक्तिगत पहचान उसकी सबसे बड़ी पूंजी है। निर्दलीय नरेश मीणा कुछ मतदान केंद्रों पर निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं, खासकर जहां जातीय प्रभाव हावी है।
प्रवृत्तियों को देखते हुए विश्लेषक मानते हैं कि इस बार मुकाबले में भाजपा को मामूली बढ़त दिख रही है। मोरपाल सुमन के पक्ष में संगठन की मजबूती और भाजपा की राज्यव्यापी प्रतिबद्धता असर डाल सकती है। फिर भी, प्रमोद जैन भाया का स्थानीय प्रभाव उन्हें पूरी तरह कमजोर नहीं पड़ने देता। अंतिम नतीजे बेहद करीब रहने की संभावना है, लेकिन अनुमान यही कहता है कि अंता की बाजी भाजपा के हाथ लग सकती है—बहुत कम अंतर से।


